Floor Test – फ्लोर टेस्ट क्या होता है? बहुमत साबित करने की प्रक्रिया और प्रकार क्या हैं?

आज-कल खबरों में महाराष्ट्र विधानसभा में हुए फ्लोर टेस्ट के चर्चे हैं. फ्लोर टेस्ट को शक्ति परीक्षण या बहुमत परीक्षण के नाम से भी जाना जाता है. किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को शपथ लेने के बाद विधान-सभा में ये साबित करना होता है कि उसके पास आधे से कम-से-कम एक ज्यादा विधायकों का समर्थन हासिल है, यही प्रक्रिया फ्लोर टेस्ट या बहुमत परीक्षण कहलाता है. 

इस पोस्ट में हम आपको Floor Test से सम्बंधित पूरी जानकारी देंगे. फ्लोर टेस्ट क्या होता है? फ्लोर टेस्टिंग में वोटिंग कैसे होती है? Floor Test कब ज्यादा जरूरी होता है? इन्ही सारे सवालों के जबाब आपको इस पोस्ट में हम देने की कोशिश करेंगे. फ्लोर टेस्ट राज्यों और केंद्र दोनों ही सरकारों के बहुमत परीक्षण के लिए सामान तरीके से होता है. इस पोस्ट में हम केवल राज्यों की सरकार के लिए होने वाले फ्लोर टेस्ट के माध्यम से समझेंगे.

फ्लोर टेस्ट क्या होता है? (About Floor Test in Hindi)

about Floor Test in Hindi
Assembly During Floor Test

Floor Test के बारे में स्पष्ट रूप से जानने के लिए पहले हमें सरकार के चयन की प्रक्रिया को समझना होगा. किसी भी राज्य में चुनावों का परिणाम आने के बाद उस राज्य का राज्यपाल (Governor), सबसे ज्यादा जीते हुए विधायकों वाली राजनीतिक पार्टी या संगठन को सरकार बनाने का बुलावा भेजता है. कभी-कभी पार्टियां भी अपनी तरफ से राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा पेश करती हैं और बहुमत के लिए आवश्यक (कुल विधानसभा सीटों के आधे से एक ज्यादा) विधायकों का समर्थन प्रस्तुत करती हैं.

राज्यपाल अपने विवेक से सबसे ज्यादा विधायकों के समर्थन वाली पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने की अनुमति देता है और तय समय सीमा के अंदर बहुमत साबित करने के लिए बोलता है. विधानसभा में बहुमत साबित करने की इसी प्रक्रिया को फ्लोर टेस्ट कहते हैं. 

फ्लोर टेस्ट के दौरान चुने हुए विधायक अपनी इच्छा के अनुसार सरकार के समर्थन या विपक्ष में वोट देते हैं. अगर विधायकों के द्वारा दिए हुए वोटों की संख्या आधे से कम से कम एक ज्यादा होती है तो सरकार फ्लोर टेस्ट में पास हो जाती है अन्यथा मुख्यमंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ता है और सरकार गिर जाती है. 

फ्लोर टेस्ट में वोटिंग किस प्रकार होती है?

फ्लोर टेस्ट में विधायक अपना नेता चुनने के लिए वोट करते हैं, यह वोटिंग तीन प्रकार से कराई जा सकती है.

  • ध्वनि-मत: सभी विधायक ध्वनि-मत द्वारा पक्ष या विपक्ष में वोट करते हैं.
  • संख्या-बल: सरकार के पक्ष में वोट करने वाले और विपक्ष में वोट करने वाले विधायक अलग-अलग खड़े होकर संख्या के आधार पर बहुमत साबित करते हैं.
  • हस्ताक्षर या गोपनीय वोटिंग: इसमें सभी विधायक एक-एक करके मत-पत्र या वोटिंग मशीन में अपना वोट देते हैं.

फ्लोर टेस्ट की प्रक्रिया क्या है?

फ्लोर टेस्ट की प्रक्रिया राज्यपाल के आदेश पर होती है. सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत करने वाले दल का नेता मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेता है और तय वक्त पर बहुमत साबित करने के लिए बाध्य होता है. फ्लोर टेस्ट की प्रक्रिया के सफल संचालन के लिए एक अस्थायी विधानसभा स्पीकर या अध्यक्ष चुना जाता है जिसे प्रोटेम स्पीकर कहते हैं. प्रोटेम स्पीकर ही floor test की पूरी प्रक्रिया का संचालन करता है. 

फ्लोर टेस्ट के दौरान विधायक मौखिक, लिखित या गुप मतदान द्वारा अपनी वोट दर्ज कराते हैं. जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं अगर कुल वोटों की संख्या आवश्यक संख्या से कम-से-कम एक अधिक होती है तो सरकार बहुमत साबित करने में सफल हो जाती है. बहुत साबित न कर पाने की स्थिति में मुख्यमंत्री और पूरी कैबिनेट को इस्तीफ़ा देना पड़ता है. 

जब किसी एक पार्टी या गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत होता है तो फ्लोर टेस्ट की प्रक्रिया केवल औपचारिकता के लिए होती है और विधायक मौखिक तौर पर ही अपना समर्थन सरकार के पक्ष में दर्शाते हैं. जब किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है और एक से ज्यादा दल सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत करते हैं तब राज्यपाल फ्लोर टेस्ट के माध्यम से तय करते हैं कि किस दल के पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त बहुमत है.

फ्लोर टेस्ट के दौरान विधायक किसी की भी पक्ष में वोट दे सकते हैं या फिर वोटिंग में शामिल होने से मना भी कर सकते हैं. जब कोई विधायक वोट नहीं देता है तो कुल विधायको की संख्या उतनी ही कम हो जाती है और बहुमत का आंकड़ा भी उतना ही कम हो जाता है.

सवाल: प्रोटेम स्पीकर (Protem Speaker) कौन होता है?

जवाब: फ्लोर टेस्ट की प्रक्रिया का सफल संचालन करने के लिए विधानसभा का एक अस्थायी अध्यक्ष चुना जाता है, इसे ही प्रोटेम स्पीकर कहा जाता है. सरकार की सिफारिश से राज्यपाल इसे चुनता है. पक्ष-विपक्ष में वोटों की संख्या सामान होने की स्थिति में प्रोटेम स्पीकर भी वोट दाल सकता है. फ्लोर टेस्ट की प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह पद निरस्त हो जाता है.

फ्लोर टेस्ट को एक उदाहरण से समझते हैं-  जैसे कि राजस्थान की विधानसभा में कुल 200 सीट हैं. राजस्थान में किसी भी सरकार को बहुमत साबित करने के लिए उसके पास कम से कम 101 सदस्यों का विश्वास प्राप्त होना चाहिए. अगर फ्लोर टेस्ट के दौरान माना कि 30 विधायक वोटिंग में शामिल नहीं हुए तो अब बहुमत का आँकड़ा केवल 86 रह जाता है. इस प्रकार जिस भी दावेदार को 86 या ज्यादा सदस्यों का समर्थन मिल जाता है वही दावेदार फ्लोर टेस्ट में पास होकर बहुमत साबित कर देता है.

इस पोस्ट में आपको फ्लोर टेस्ट के बारे में पूरी जानकारी (Floor Test Explained in Hindi) दी गयी है. अगर इस पोस्ट से रिलेटेड आपके पास कोई सवाल है तो आप कमेंट सेक्शन में हमसे पूछ सकते हैं. 

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